प्रथम वर्ष में होने वाले शिशु की शारीरिक गतिविधियां।

यह कहना आवश्यक है कि शिशु के जीवन का प्रथम वर्ष बहुत महत्त्व रखता है। प्रथम वर्ष का जीवन वैसा नहीं होता है जैसा की हम समझते है। भिन्न होता है, कठिन होता है, उलझन भरा होता है। कोमल शरीर होने के कारण यह अधिक ध्यान मांगता है। रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती है। थोड़ी-सी कमी आ जाने पर, थोड़ा-सा फर्क होने पर वह शीघ्र बीमार पड़ सकता है। सामान्य से अधिक सर्दी सहन करने में कठिनाई महसूस करता है। सामान्य से अधिक गर्मी में भी उसे कठिनाई महसूस होती है।

शिशु की शारीरिक गतिविधियां पहले वर्ष में

1. शिशु की सबसे अधिक वृद्धि उसके इस पहले वर्ष में ही हुआ करती है।

2. इन बारह महीनों के अंत तक शिशु के शरीर का वजन उत्पन्न होने के समय में वजन से तीन गुना हो जाता है।

3. बारह महीनों में तो तिगुना होता है, मगर केवल पहले चार महीनों में दो गुना हो जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि पहले वर्ष के पहले चार महीनों में वृद्धि अत्यधिक होती है। शिशु के भार में वृद्धि दूसरे वर्ष में और कम होने लगती है। अतः जिसने अपने मुन्ने का प्रथम वर्ष में पर्याप्त ध्यान नहीं रखा, तो उसे क्षति होगी। जिसकी पूर्ति कभी नहीं हो सकेगी।

4. धीरे-धीरे वृद्धि की दर घटती जाएगी। युवावस्था को प्राप्त होने पर वह केवल बीस गुना बढ़ पाता है। यदि एक वर्ष में चार गुना न मानकर तीन गुना होने का फार्मूला लगाएं, तो बीस वर्ष की आयु तक 60 गुना हो सकता था। मगर नहीं, प्रकृति ने शिशु के पहले चार महीनों में जो वृद्धि का प्रावधान रखा, उसे घटाते हुए पहले वर्ष में कम किया। आगे चलकर और भी कम।

5. शिशु जब ढाई वर्ष का हो जाता है, तब उसके शरीर का भार जन्म के भार से चौगुना माना जाता है। आप घर में ‘बेबी स्केल को रखकर शिशु की वृद्धि पर नजर रखें तथा जब उसे तौलें, तो नोट करती रहें।

6. शिशु के शरीर की वृद्धि प्रत्येक वर्ष एक समान नहीं होती।

7. एक वर्ष में तीन गुना, ढाई वर्ष में चार गुना और फिर पांच वर्ष में पांच गुना, जिसको दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं-'प्रथम वर्ष में तीन सौ प्रतिशत, दूसरे वर्ष में बीस प्रतिशत, तत्पश्चात प्रत्येक वर्ष में दस प्रतिशत की वृद्धि होती है।

8. जहां तक शिशु की लंबाई में वृद्धि की बात है, शिशु जन्म के समय सोलह इंच से बीस इंच तक के कद वाला होता है। यदि माता-पिता की अपनी ऊंचाई बहुत कम हो, तो यह तेरह-चौदह इंच भी हो सकती है।

नोट:- जन्म की लंबाई को ध्यान में रखकर कह सकते हैं। कि वह :

i. प्रथम वर्ष में चालीस प्रतिशत बढ़ती है।

ii. चौथे और पांचवें वर्ष में यह जन्म की लंबाई से दो गुनी हुआ करती है।

iii. जब बालक तेरह वर्ष का हो जाता है, तो उसकी लंबाई जन्म से तीन गुना हो जाती है।

9. शिशु बाहर से ही नहीं, अंदर से भी विकास पाता रहता है। उसके प्रत्येक अंश में वृद्धि होती रहती है। मगर भीतरी अंगों की वृद्धि का अनुपात बाहरी अगों की वृद्धि से मेल नहीं खाता। दोनों का आपस में कोई निश्चित अनुपात नहीं होता। कोई सीधा तालमेल नही बनता।

10. शरीर के भिन्न अंगों की वृद्धि भी समान रूप से नहीं हुआ करती। न ही समान गति से।

11. शरीर की सामान्य वृद्धि भी एक जैसी नहीं होती। कुछ वर्षों में अधिक तो कुछ वर्षों में कम। यह सब शरीर की प्रकृति, देखभाल, भोजन आदि पर भी निर्भर करता है। एक शरीर की वृद्धि भी दूसरे शरीर के समान नहीं होती।

12. शिशु में शरीर की लंबाई प्रति-वर्ष:-

  • प्रधम वर्ष में सबसे अधिक होती है।
  • दूसरे वर्ष में शरीर की वृद्धि की मात्रा कम हो जाती है।
  • तीसरे में सामान्य-सी रहती है।
  • चौथे वर्ष में एक बार फिर बढ़ जाती है।
  • इ. पांचवे वर्ष में सामान्य ही रहती है।
  • शरीर की लंबाई की वृद्धि छठे तथा ग्यारहवें वर्ष में तेज हो जाया करती है।

13. चूंकि हम जान चुके हैं कि पहले, चौथे, छठे और ग्यारहवें वर्षों में वृद्धि अधिक हुआ करती है, इसलिए इन चार वर्षों में वृद्धि के अनुरूप ही बच्चे की देखभाल, बच्चे की खुराक, बच्चे को प्रसन्न तथा आमोद-प्रमोद का व्रातावरण देना मां का फर्ज है। यदि उसे अतिरिक्त खुराक नहीं मिलेगी, तो हमारे शिशु का विकास उतना नहीं हो पाएगा, जितना प्रकृति ने निर्धारित किया है।

14. प्रकृति ने मनुष्य का शरीर कई प्रकार से जटिल बनाया है। इसके विकास का मापदंड भी जटिल माना जा सकता है। अब हमें यह जान लेना चाहिए कि शरीर के भागों की लंबाई के अनुपात में भी अंतर हो जाता है। शिशु के जन्म के समय धड़ की लंबाई लगभग पूरे शरीर की लंबाई की आधी होती है। कपाल से चिबुक तक की लंबाई एक चौथाई (25%) होती है। कूल्हे से पांव तक का नाप 38 प्रतिशत के लगभग होता है।

जब शिशु नौजवान होकर इक्कीस वर्ष की आयु पा लेता है, तो कपाल से चिबुक तक की लंबाई कुल लंबाई की साढे बारह प्रतिशत रह जाती है। 25 प्रतिशत की बजाए तब कुल्हे से पांव तक की लंबाई कुल लंबाई का 50 प्रतिशत हो जाती है। यानी वृद्धि 38 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक होती है।

15. शरीर विशेषज्ञों का मानना है कि मांसपेशियों की शिशु के शरीर में वृद्धि शरीर की वृद्धि की अपेक्षा दो गुनी होती है।

16. जब शिशु जन्म लेता है, तो उसके शरीर की पेशियां कुल भार का केवल तेरह प्रतिशत होती हैं। जब शिशु युवक बन चुका होता है, तो पेशियां तैंतालीस प्रतिशत हो जाती हैं। है न अत्यधिक विकास, जिसका बाहरी शरीर की वृद्धि से कोई ताल्लुक नहीं होता है।

17. शिशु के यकृत और मस्तिष्क में होने वाली वृद्धि सबसे कम मानी गई है। इनमें भी मस्तिष्क की और भी कम।

18. जन्म के समय मस्तिष्क का भार शरीर का सातवां हिस्सा होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, शरीर का भार बढ़ता जाता है। यह वैसे नहीं बढ़ता, बहुत कम वृद्धि से बढ़ता है। जब युवावस्था आती है, तो मस्तिष्क का भार शरीर के भार का बीसवां हिस्सा होता है।

19. युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते यकृत शरीर के भार का केवल पच्चीसवां भाग रह जाता है।

20. हृदय की वृद्धि भी बड़ी धीरे-धीरे होती है। जब शिशु युवावस्था के करीब पहुंचता है, तो इसकी विशेष वृद्धि होती है। जब शिशु पैदा होता है, तो यह केवल 20 सी.सी. होता है। जब बालक चौदह वर्ष का होता है, तो हृदय 120 सी.सी. हो जाता है। फिर एकदम बढ़ता रहता है। सत्ररह-अठारह वर्ष की आयु में हृदय 270 सी.सी. हो जाता है, जो विशेष रूप से अधिक होता है।

21. जननेन्द्रियों तथा पेशियों की वृद्धि की गति इसी काल में अधिक होकर काफी बढ़ जाती है।

22. शरीर की लंबाई और भार की वृद्धि के साथ-साथ मानसिक विकास का क्रम निम्न प्रकार होता है, शारीरिक विकास के साथ-साथ शिशु में मानसिक रूप से भी समझ आने लग जाती है। वह चीजों को छूने, पकड़ने, खींचने, उठाने लग जाता है। अपने चारों ओर को देखता है। समझने की कोशिश करता है।

(और पढ़े:- नवजात शिशु का पहला साल क्यों महत्वपूर्ण होता है)

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