नवजात शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास

पहला महीना : पहले महीने शिशु थोड़ा सुनने की कोशिश करता है। जिस ओर से आवाज आए, उधर देखने लगता है। सिर उठाने की कोशिश जरूर करता है, मगर संभाल नहीं पाता। उसके सामने रोशनी या रंगदार, चमकीली चीज ले जाएं, तो उस ओर नजर करता है। मां को गौर से देखता है। उसकी तस्वीर अपने मन में उतारने का प्रयत्न करता है। उसे कुछ पकड़ाओ, तो पकड़ने की कोशिश करता है, मगर संभाल नहीं पाता।

दूसरा महीना : अब वह मां की आवाज तथा उसकी शक्ल को थोड़ा-थोड़ा पहचानने लगता है। कुछ आवाजें भी निकालता है, जो अस्पष्ट होती हैं। उसे शब्द सुनाई देते हैं। उधर देखता है। कुछ पकड़ाओ तो पकड़ता है। हलकी चीज संभाल लेता है। पिछले महीने सिर उठाना तो सीख गया था, मगर संभाल नहीं सकता था। अब वह संभालने लगता है।

तीसरा महीना : बच्चा अब तक दो महीने का हो चुका होता है। तीसरे में प्रवेश कर, सिर उठाने, घुमाने की कोशिश करता है। अब उसकी आंखें, उसका सिर आवाज का पीछा करता है। जिधर से ध्वनि आए, उस ओर तब तक देखता रहता है, जब तक आवाज आती रहे। अब तो वह मां क चलने से होने वाली आहट पर भी कान रखने लगता है। पांव उठाता-पटकता है। पेट के पास पड़ी चीज स्वयं उठा लेता है। पेट के बल लिटाने पर हाथ-पांव सिर अधिक चलाने लगता है।

चौथा महीना : शिशु तीन महीने पूरे करके जब चौथे महीने में पहुंचते हैं, तो उनके भार तथा लंबाई, दोनों में अच्छी वृद्धि होने लगती है। वह थोड़ा-थोड़ा सरकना शुरू कर देता है। सिर उठाता है। कंधे हिलाता है। पास में जो वस्तुएं पड़ी होती हैं, उन्हें उठाता है। अपनी ओर खींचता है।

नहलाने से आनंदित होता है। अब जो कुछ भी हाथ लगे, उसे अच्छी पकड़ में जकड़ने लगता है। खिलौने पकड़कर छोड़ता नहीं। जो कुछ भी हाथ लगे, उसे मुंह में डालने का प्रयत्न करता है।

पांचवां महीना : सिर उठाता है, तो संभाल भी लेता है। इस पांचवें महीने में वह थोड़ा-थोड़ा सिर घुमाने, आंखें फेरने लगता है। उसके मुंह से अब थोड़ी लंबी आवाजें भी निकलती हैं। भूख में रोता है। खाना न मिले तो चिल्लाता है। खिलौने खींचता है। लिटा दो तो पलटने तथा टांगें मारने की कोशिश करता है।

छठा महीना : छठे महीने के आरंभ में बच्चा थोड़ा-थोड़ा बैठने लगता है। पहले संभालना पड़ता है, फिर धीरे-धीरे कुछ देर बिना सहारे बैठ सकता है। हाथ में कुछ भी आ जाए, या तो उसे सामने जमीन या मेज आदि से टकराने की कोशिश करता है या उसे खाने, चबाने मुंह में डालने का भरसक प्रयत्न करता है। मां को अच्छी तरह पहचानता है।

सातवां महीना : अब तो वह पेट के बल खिसक भी लेता है। यह उसके इस दुनिया में आने का सातवां महीना है, जब उसे कुछ देर बैठे रहने की आदत हो जाती है, तो थोड़ा सहारा पाकर उठने की कोशिश करता है। मगर संभव नहीं हो पाता। यदि बोतल से दूध पिलाएं, तो बोतल को पकड़ने-संभालने लगता है।

स्वयं सिर उठा लेता है। चद्दर आदि को खींच लेता है। उसकी पकड़ मजबूत होने लगती है। उंगलियों में उंगलियां दें, तो दोनों हाथों को इकट्ठा रखने लगता है।

आठवां महीना में।

  • चीजें पकड़कर उठा लेता है। भारी न हों तो फेकता भी है।
  • अब कुछ सरकना सीख जाता है। पेट के बल लिटाएं, तो टांगों या पैरों का दबाव बनाकर आगे चल पड़ता है। इस आठवें महीने में उसका शरीर काफी पुष्ट होने लगता है तथा पकड़ में और भी मजबूती आ जाती है।
  • उसे अकेले बिठा सकते हैं। उसको थोड़ा तकियों का सहारा देकर, कुछ खिलौने रखकर खेलने को छोड़ा जा सकता है। चूंकि नीचे गद्दा है तथा चारों ओर तकिए, इसलिए उसके गिरने या चोट लगने का डर नहीं होता।
  • अब वह घर के कुछ लोगों की पहचान, उनकी आवाज, आवाज का कुछ-कुछ अर्थ भी समझ सकता है। उनको देखकर, हाथ उठाकर, गोदी में लेने का संकेत करता है।
  • भय का ज्ञान भी होने लगता है। ऊंची आवाज से घबरा उठता है। किसी नए व्यक्ति को देखकर, उसकी ओर नहीं लपकता। बल्कि वह उठाने लगे, तो नहीं जाता रोता है। मां को पुकारता है, मगर उसके शब्द समझ में नहीं आते।
  • अब तक वह गर्दन काफी घुमा लेता है तथा जिस ओर से आवाज आए, उस ओर देखने लगता है।

नवां महीना : शिशु जब नवें महीने में पहुंच जाता है तो-

  • उसके स्वभाव का अनुमान लगने लगता है।
  • वह प्रसन्न रहने वाला है या चिड़चिड़ा, यह आभास भी हो जाता है।
  • शर्मीला है या मिलनसार, यह भी इसी काल में सामने आने लगता है।
  • अब वह रेंगने के अतिरिक्त करवटें बदलना खूब सीख चुका होता है।
  • चीज हाथ में आने पर इसे दूर फेंकने की कोशिश करता है। गेंद वगैरह से खेलने, फेंकने, धकेलने की आदत बना लेता है।
  • खिलौनों की आवाजें उसे अच्छी लगती हैं।
  • टी.वी. आदि से निकलने वाली आवाजों की ओर आकृष्ट होता है। उसे मधुर आवाजें अच्छी लगती हैं। करकश आवाजों से डरता है।
  • नवें महीने में उसके मुंह से निकलने वाली आवाजें कुछ-कुछ स्पष्ट होने लगती हैं। इन आवाजों से पता चल जाता है कि वह मां को पुकार रहा है। यह भी अनुमान के तौर पर।
  • अब वह अपने वहां होने का आभास कराना चाहता है। वह देखकर हंसेगा। ध्यान न देने पर रोएगा, चिल्लाएगा।
  • वह चाहता है कि उसको सहारा देकर चलाया जाए, मगर टांगें भार सहन नहीं कर पातीं। फिर भी अभिभावकों की अच्छी पकड़ पाकर वह खड़ा होने, लड़खड़ाने की-सी हरकतें करता है।
  • अब तक वह दूध, रस, दाल का पानी तो लेता ही है, कुछ-न-कुछ ठोस भी लेकर मुंह चलाने की कोशिश करता है।

दसवां महीना में-

  • दसवां महीना शिशु को सीखने के लिए बड़ा महत्त्व रखता है। अब तक वह सहारे के साथ खड़ा हो जाता है। उसकी टांगें थोड़ा-थोड़ा वजन भी संभालने लगती हैं।
  • सहारे के साथ, रेलिंग के साथ, चारपाई के साथ उसे खड़ा करें, तो वह थोड़ा चलने लगता है। वह डंडे को, रेलिंग को भी मुंह में डालने लगता है। कुछ कदम आगे खिसक भी सकता है।
  • कुछ दिनों की कोशिश से, वार्कर में, रेहड़े में वह आगे चलने में थोड़ा-थोड़ा सफल भी हो जाता है।
  • दूध की बोतल को खूब संभाल सकता है। खाने को कुछ दें, तो उसे भी स्वयं खाने की कोशिश करता है।
  • उसकी भूख भी पहले से बढ़ जाती है। हाथ-पांव भी खूब चला लेता है। कुछ भी देखकर खाने को मांगता है। न मिलने पर या जरा-सी देरी होने पर खूब शोर मचाता है, चिल्लाता है।

ग्यारहवां महीना : शिशु अब ग्यारहवें महीने में प्रवेश कर चुका है। अब वह खाने को अधिक मांगता है। ‘न’ ‘हां के शब्दों को थोड़ा समझने लग जाता है। मां के चेहरे पर आ गई हंसी का अर्थ जानता है। उनके क्रोध, विनोद, मजाक, विषाद को खूब समझता है। अब वह थोड़ा सहारा पाकर कई कदम चल लेता है। वाकर आदि में भागता है। उसको जो चीज नजर आ जाए, उसे लेना चाहता है। लेकर छोड़ता नहीं।

बारहवां महीना : बारहवें महीने में शिशु इशारे समझने लगता है। कुछ-कुछ शब्दों का अर्थ भी समझता है। आज्ञा का पालन भी करने लगता है। मांगना, लेने से इनकार करना, आंखों व सिर से संकेत करना तथा इनका अर्थ समझना सीख जाता है। उसके शरीर में ताकत बढ़ जाती है। उंगली पकड़कर काफी चल लेता है। उसमें खुशी, हंसी, क्रोध, भय, अपनापन, दूसरों की पहचान की अनेक वृत्तियां सशक्त होकर काम करने लगती हैं।

अब चोट लगने पर बराबर की चोट देना चाहता है। कई शब्द निकाल सकता है। इनका कुछ-कुछ भाव भी समझा जा सकता है।

नोट:- इस प्रकार शिशु अपना पहला वर्ष पूरा कर लेता है। यह वर्ष इस प्रकार से बड़ा मूल्यवान होता है। यही शिशु के भविष्य का आधार भी है। शरीर की बलिष्ठता का आधार भी इसी पहले वर्ष में बनता है।

(और पढ़े:- नवजात शिशु का पहला साल क्यों महत्वपूर्ण होता है)

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